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हिंदू समाज का सबसे बड़ा संकट: बाहरी आक्रमण नहीं, भीतर की आत्महीनता

✍️ कैलाश चन्द्र

किसी भी सभ्यता का पतन केवल बाहरी आक्रमणों से नहीं होता; उससे पहले उसका क्षय भीतर से शुरू होता है। जब कोई समाज अपने इतिहास से लज्जित होने लगे, अपनी परंपराओं को पिछड़ेपन का प्रतीक मानने लगे, अपने पुरखों का उपहास करने लगे, अपने धर्म को अंधविश्वास कहकर तिरस्कृत करने लगे और अपनी ही सांस्कृतिक स्मृति से कटकर स्वयं को आधुनिक घोषित करने लगे, तब समझ लेना चाहिए कि उसके संकट का सबसे खतरनाक चरण आरम्भ हो चुका है। हिंदू समाज आज ठीक इसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। उसके सामने केवल मतांतरणकारी शक्तियाँ, मजहबी कट्टरता, राजनीतिक इस्लाम, आक्रामक मिशनरी तंत्र या बाहरी वैचारिक आक्रमण ही चुनौती नहीं हैं; उससे भी बड़ी चुनौती उसके भीतर बैठा वह आत्महीन, जड़ों से कटा, बौद्धिक दंभ से भरा तथाकथित “सेकुलर” हिंदू है, जो अपने ही धर्म, समाज और सभ्यता को कठघरे में खड़ा करके स्वयं को विवेकशील समझता है।

यह समस्या केवल कुछ लोगों के निजी विचारों की नहीं है; यह उस मानसिक ढाँचे की समस्या है जिसने हिंदू समाज के एक हिस्से को इस भ्रम में डाल दिया है कि अपने धर्म को गाली देना ही आधुनिकता है, अपनी परंपराओं का मज़ाक उड़ाना ही प्रगतिशीलता है, मंदिरों और पुराणों का उपहास करना ही तर्कशीलता है, और ब्राह्मण-विरोध, सनातन-विरोध तथा हिंदू प्रतीकों के अवमूल्यन को ही सामाजिक न्याय का पर्याय मान लेना बौद्धिक साहस है। यह वही मानसिकता है जो गीता पढ़े बिना हिंदू धर्म पर निर्णय सुना देती है, उपनिषद जाने बिना अध्यात्म को अंधविश्वास बता देती है, संत परंपरा को समझे बिना सनातन को सामाजिक दमन का उपकरण घोषित कर देती है और अपने समाज की हजारों वर्षों की बौद्धिक परंपरा को “ब्राह्मणवाद” जैसे एक राजनीतिक शब्द में समेटकर खारिज कर देना चाहती है। ज्ञान का अभाव और आत्मविश्वास का अतिरेक जब साथ आते हैं, तब वे समाज के भीतर सबसे विषाक्त बौद्धिक वातावरण बनाते हैं।

दुर्भाग्य यह है कि भारत का एक बड़ा “सेकुलर” हिंदू वर्ग अभी भी सभ्यताओं के संघर्ष को केवल चुनावी राजनीति की भाषा में समझना चाहता है। उसे लगता है कि पहचान, जनसंख्या, मतांतरण, मजहबी कट्टरता, सांस्कृतिक निरंतरता, राष्ट्रीय निष्ठा और सभ्यतागत आत्मरक्षा जैसे प्रश्न केवल “राइट विंग प्रोपेगैंडा” हैं, या फिर ये सब भाजपा बनाम कांग्रेस, मोदी बनाम विपक्ष, दक्षिणपंथ बनाम वामपंथ की बहसें हैं। यह दृष्टि स्वयं में एक बौद्धिक त्रुटि है। दुनिया का बड़ा हिस्सा आज इस प्रश्न से जूझ रहा है कि जब किसी समुदाय की प्राथमिक निष्ठा राष्ट्र, संविधान और स्थानीय सभ्यता से ऊपर किसी वैश्विक मजहबी-राजनीतिक पहचान में केन्द्रित होने लगती है, तब सामाजिक तनाव, सांस्कृतिक टकराव और सुरक्षा संकट क्यों पैदा होते हैं। यह प्रश्न केवल भारत का नहीं है; यह 21वीं सदी की एक केंद्रीय वैश्विक चुनौती है।

यूरोप के अनेक देशों में यह संकट अलग-अलग रूपों में सामने आया है। फ्रांस को अपने गणतांत्रिक मूल्यों और मजहबी अलगाववाद के बीच तनाव का सामना करना पड़ा है। इंग्लैंड में समानांतर सामुदायिक निष्ठाओं, कट्टरपंथी नेटवर्कों और पहचान-आधारित राजनीति पर गंभीर बहसें होती रही हैं। जर्मनी और इटली जैसे देशों में प्रवासन, सांस्कृतिक समाकलन, जनसांख्यिकीय असंतुलन और राष्ट्रीय पहचान के प्रश्न राजनीतिक विमर्श के केंद्र में हैं। एशिया में भी म्यांमार, चीन और अन्य देशों ने मजहबी कट्टरता, जनसंख्या-संतुलन, सुरक्षा और सामाजिक तनाव के प्रश्नों को राज्य-स्तर पर गंभीरता से लिया है। इन सबके बीच यह पूछना आवश्यक है कि क्या इन देशों में मोदी बैठे हैं? क्या वहाँ संघ है? क्या वहाँ “भक्त” हैं? यदि नहीं, तो फिर वही प्रश्न वहाँ क्यों उपस्थित हैं? उत्तर स्पष्ट है—क्योंकि यह किसी एक दल, एक नेता या एक देश की समस्या नहीं, बल्कि उस आधुनिक विश्व की समस्या है जहाँ मजहबी पहचान, राजनीतिक लामबंदी, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सभ्यतागत असुरक्षा के प्रश्न तेजी से उभर रहे हैं।

भारत की त्रासदी यह है कि यहाँ इन प्रश्नों पर गंभीर विमर्श करने के बजाय उन्हें तुरंत सांप्रदायिकता, बहुसंख्यकवाद या फासीवाद की श्रेणी में डाल दिया जाता है। यदि कोई हिंदू समाज के भीतर सांस्कृतिक विघटन, मंदिरों की दुर्दशा, शिक्षा में सभ्यतागत शून्यता, मतांतरण के जाल, या जनसंख्या-संतुलन जैसे विषयों पर बात करे, तो उसे पहले राजनीतिक खांचे में ठूँस दिया जाता है और फिर नैतिक रूप से अमान्य घोषित करने की कोशिश की जाती है। यह बौद्धिक ईमानदारी नहीं है; यह असुविधाजनक प्रश्नों से बचने की तकनीक है। किसी भी सभ्यता के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर बिना अपराधबोध के विचार करे। यदि यूरोप अपनी सीमाओं, पहचान और सामाजिक संतुलन को लेकर चिंतित हो सकता है, यदि एशिया के अनेक देश मजहबी कट्टरता और अलगाववादी निष्ठाओं को लेकर सजग हो सकते हैं, तो हिंदू समाज को अपनी सभ्यतागत सुरक्षा पर विचार करने का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?

हिंदू समाज की सबसे बड़ी कमजोरी उसका बाहरी शत्रु नहीं, उसकी आंतरिक आत्महीनता है। यह आत्महीनता उसे अपनी ही जड़ों से शर्मिंदा करती है। वह अपने धर्म को “रूढ़ि” कहकर किनारे कर देता है, अपने संतों और आचार्यों को अप्रासंगिक मान लेता है, अपने शास्त्रों को पढ़े बिना अस्वीकार कर देता है और अपनी परंपराओं को “वैज्ञानिकता” की अदालत में खड़ा करके केवल उपहास का विषय बना देता है। यह स्थिति किसी स्वस्थ समाज की नहीं हो सकती। जो समाज अपने ही पुरखों का अपमान करता है, अपनी ही आस्था को अंधविश्वास कहता है, अपने ही प्रतीकों पर हँसता है और अपनी ही सांस्कृतिक स्मृति को बोझ समझता है, वह दूसरों से सम्मान नहीं पाता; वह केवल विखंडित होता है, दिशाहीन होता है और अंततः शिकार बनता है।

इस आत्महीनता का एक और खतरनाक रूप है—हिंदू समाज को उसके आंतरिक विभाजनों में स्थायी रूप से कैद कर देना। यह मान लेना कि हिंदू समाज को ब्राह्मण, सवर्ण, पिछड़ा, दलित, उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, मंदिरवादी, कर्मकांडी, सुधारवादी आदि खाँचों में बाँटकर ही कोई न्यायपूर्ण आधुनिकता निर्मित की जा सकती है, एक गंभीर भूल है। समाज के भीतर सुधार की आवश्यकता से कौन इनकार कर सकता है? जाति-आधारित अन्याय, सामाजिक विषमता, भेदभाव और ऊँच-नीच की समस्याएँ वास्तविक रही हैं और उनके विरुद्ध संघर्ष भी आवश्यक रहा है। परंतु सुधार और विघटन में अंतर होता है। यदि सुधार की भाषा अंततः साझा सभ्यतागत पहचान को ही नष्ट करने लगे, यदि न्याय के नाम पर समाज की सांस्कृतिक रीढ़ ही तोड़ दी जाए, यदि सनातन परंपरा को केवल अपराधों की सूची में बदल दिया जाए, तो उसका परिणाम न्याय नहीं, विखंडन होगा। विखंडित समाज सबसे आसान शिकार होता है, क्योंकि उसके पास न साझा स्मृति बचती है, न सामूहिक आत्मरक्षा की इच्छा, न भविष्य के लिए कोई सभ्यतागत संकल्प।

यही वह बिंदु है जहाँ सेकुलरिज़्म, सहिष्णुता और उदारता की परिभाषाओं पर पुनर्विचार आवश्यक हो जाता है। सेकुलरिज़्म का अर्थ अपने धर्म से घृणा करना नहीं है। सहिष्णुता का अर्थ यह नहीं कि आपकी आस्था का प्रतिदिन उपहास हो, आपकी संतानों को आपकी जड़ों से काटा जाए, आपकी परंपराओं को अपराधबोध से भर दिया जाए, और आप इसे “उदारता” कहकर स्वीकार कर लें। उदारता और आत्मसमर्पण दो भिन्न बातें हैं। किसी भी सभ्य समाज को दूसरों के अधिकारों का सम्मान करना चाहिए, पर यह सम्मान अपनी अस्मिता को नकारकर नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ ही संभव होता है। जो समाज स्वयं अपनी पहचान से घृणा करता है, वह दूसरों के साथ वास्तविक समानता का संबंध भी स्थापित नहीं कर सकता; वह केवल लगातार रक्षात्मक, अपराधबोधग्रस्त और अस्थिर बना रहता है।

यह भी समझना होगा कि किसी राजनीतिक दल से असहमति रखना और हिंदू अस्मिता को ही संदेह की दृष्टि से देखना—दोनों एक ही बात नहीं हैं। मोदी, भाजपा, संघ, योगी या किसी भी अन्य संगठन और नेता की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है; उस पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन यदि हर बार हिंदू सुरक्षा, हिंदू अधिकार, हिंदू सभ्यता, मंदिरों की स्वायत्तता, मतांतरण, सांस्कृतिक संरक्षण या जनसंख्या-संतुलन जैसे प्रश्न उठते ही प्रतिक्रिया यह हो कि “यह सब साम्प्रदायिकता है”, “यह बहुसंख्यक उन्माद है”, “यह फासीवाद है”, तो यह राजनीतिक आलोचना नहीं, बल्कि एक गहरी बौद्धिक बीमारी का लक्षण है। इसका अर्थ यह है कि हिंदू समाज को अपने अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर विचार करने का नैतिक अधिकार भी नहीं दिया जाएगा। यही वह मानसिकता है जिसने लंबे समय तक हिंदू समाज के बड़े हिस्से को निष्क्रिय, अपराधबोधग्रस्त और असंगठित बनाए रखा।

समय आ गया है कि हिंदू समाज स्वयं से कुछ असुविधाजनक प्रश्न पूछे। क्या वह अपने धर्म को पढ़ेगा, या उसके बारे में केवल विरोधियों की भाषा में ही सोचेगा? क्या वह अपने इतिहास को समझेगा, या केवल पराजयों, अपराधबोध और आत्मनिंदा की कथा सुनता रहेगा? क्या वह अपनी संतानों को अपनी सभ्यता, अपने महापुरुषों, अपने दार्शनिक आधार, अपनी तीर्थ-परंपरा और अपनी सांस्कृतिक स्मृति से परिचित कराएगा, या उन्हें केवल उपभोक्तावादी, इतिहास-विहीन और जड़ों से कटा हुआ नागरिक बनने देगा? क्या वह राजनीतिक असहमति और सभ्यतागत आत्मघात के बीच अंतर कर पाएगा? क्या वह सामाजिक सुधार को अपनी सांस्कृतिक आत्महत्या का औजार बनने से रोकेगा? क्या वह यह समझेगा कि ब्राह्मण-गाली, सनातन-विरोध और हिंदू-उपहास किसी भी समाज को आधुनिक नहीं बनाते, केवल खोखला बनाते हैं?

किसी भी समाज का भविष्य केवल उसकी संख्या से सुरक्षित नहीं होता। संख्या बड़ी हो सकती है, पर यदि समाज स्मृति में खोखला, आत्मविश्वास में कमजोर, विचार में भ्रमित और संगठन में विखंडित हो, तो वह अपने ही घर में असुरक्षित हो सकता है। हिंदू समाज के सामने आज यही खतरा है। उसकी सबसे बड़ी लड़ाई बाहर के शत्रुओं से पहले अपनी आत्महीनता, अपने बिखराव, अपने इतिहास-विस्मरण और उस नकली सेकुलर गर्व से है जो उसे अपनी ही जड़ों से काटता है। यदि वह अभी भी नहीं समझेगा कि सभ्यता केवल जनसंख्या से नहीं, बल्कि स्मृति, आत्मबोध, सांस्कृतिक निरंतरता और आत्मरक्षा की इच्छा से बचती है, तो वह संख्या में बड़ा होकर भी शक्ति में छोटा, विचार में निर्बल और भविष्य में असुरक्षित बना रहेगा।

हिंदू समाज को किसी के विरुद्ध घृणा से नहीं, बल्कि अपने प्रति स्पष्टता से खड़ा होना होगा। उसे अपने धर्म को पढ़ना होगा, अपनी परंपराओं को समझना होगा, अपने समाज की कमजोरियों को ईमानदारी से स्वीकार करते हुए भी अपनी सभ्यता के प्रति सम्मान बनाए रखना होगा। उसे सुधार चाहिए, आत्मविनाश नहीं; उदारता चाहिए, आत्मसमर्पण नहीं; आधुनिकता चाहिए, आत्मविस्मृति नहीं। जिस दिन हिंदू समाज यह भेद समझ लेगा, उसी दिन उसकी सबसे बड़ी लड़ाई आधी जीत ली जाएगी। क्योंकि किसी भी सभ्यता की वास्तविक पराजय तब नहीं होती जब उस पर बाहर से हमला होता है; वह तब होती है जब वह भीतर से यह मान लेती है कि उसके पास बचाने लायक कुछ है ही नहीं। हिंदू समाज के लिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या वह अभी भी अपने पास बचाने योग्य कुछ मानता है, या वह अपनी ही स्मृति के विरुद्ध खड़ा होकर इतिहास से हार मान चुका है?
✍️ कैलाश चन्द्र

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